samacharvideo : उत्तरप्रदेश का चुनावी दंगल आखिर थाम ही गया। चुनाव थमने के साथ साथ ही कई दलों का भविष्य भी थम गया है। नतीजों की बात करे तो भाजपा पूर्ण अभूमत के साथ अपनी सरकार बना रही है तो वहीँ सपा कांग्रेस गठबंधन इस मामले में बहुत पीछे रह गया। पर क्या आपने सोचा है कि दो बड़े दलों के गठबंधन के बावजूद भी सपा और कांग्रेस मोदी और भाजपा के सामने फिसड्डी नजर आये। क्या वजहें थे की ये दल भाजपा और मोदी की आंधी को रोक नही पाये… ? तो आइये हम आपको बताते है उन कारणों के बारे में जिसकी वजह से अखिलेश यादव और गठबंधन बुरी तरह हार गए…


1. मुलायम सिंह की नाराजगी:
समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की हार के पीछे सबसे बड़ा कारण मुलायम सिंह और उनके खेमे से अखिलेश की नाराजगी भी है, जिसके कारण मुलायम सिंह के समर्थकों ने अखिलेश से बदला लेने की तक ठान ली।

2. कांग्रेस से गठबंधन: यदि समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश चुनाव हारी है तो उसके पीछे कांग्रेस का बहुत बड़ा हाथ है। जहां गठबंधन, भाजपा को रोकने के लिए किया गया था तो वहीँ कांग्रेस और सपा के कई नेता इस गठबंधन से खुश नही थे, जिसका खामियाजा चुनावी नतीजों में साफ़ नज़र आ गया।

 3. मुस्लिमों का नही मिला साथ: मुस्लिमों को पार्टियां एक वोट बैंक की तरह यूज़ करती है, पर इस बार सब उल्टा हो गया। वहीँ सपा सरकार और दंगों का साथ भी मुस्लिमों को खटका। मुजफ्फरपुर दंगा इसमें सबसे बड़ा  उदाहरण हो सकता है। इस दंगे पर सपा सरकार का रवैया और मुस्लिमों की सुरक्षा, दोनों ही दृष्टिकोण से कहिलेश नाकाम होते दिखे। इस मसले से मुस्लिम पहले से ही सपा से ख़फ़ा थे, उसके बाद खुद मोदी ने दूसरे चरण के चुनाव के बाद सपा सरकार को धर्म के आधार पर घेर लिया, जिससे जाहिर तौर पर भाजपा को बड़ा फायदा मिला और सपा को भारी नुकसान।

4. अति पिछड़ा लोगों का बदला मन: विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ़ है कि इस बार गैर यादव, गैर जाटव और गैर ब्राम्हण वोट भी भाजपा के पाले में पड़े है। अखिलेश सरकार की बात करे तो, उसमे यादवों पर विशेष ध्यान दिया गया तो वहीँ गैर यादव व् पिछले लोगों पर अत्याचार कायम रहा। इसी बीच मोदी ने आकर पूरा माहौल बदल दिया, भाजपा की और से इन्ही को अधिक टारगेट किया गया, जिससे इस वर्ग के लोगों का मन बदल गया और वोट भाजपा के पाले में आ गिरे।

5. टिकट बटवारें: लगभग एक साल से चल रहा सपा का अंतर्कलह उसे ले डूबा। इस अंतर्कलह से सपा के टिकेट बटवारे पर भी खासा असर पड़ा। ज्ञात हो की सपा ने लगभग एक साल पहले से अपने उम्मीदवारों को टिकट दे दिया था, पर बाद में कहिलेश और शिवपाल खेमे ने अपने अलग अलग टिकेट जारी किये, कई सूचियां आयी और एक साल पहले जारी टिकेट में से भी कई उम्मीदवारों के टिकेट काट दिए गए। यही नही, कई सीटों पर सपा के उम्मीदवार दूसरे सपा उम्मीदवार से ही लड़ रहे थे, जिसका परिणाम आज समाजवादी पार्टी खुद भुगत रही है।

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