samacharvideo: होली का त्यौहार मतलब गुलाल, रंग, ठंडाई, मस्ती… और भी बहुत कुछ ! होली की बात करते ही हमे अपना बचपना याद आ जाता है तो वहीँ पुराने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने का मौका भी मिलता है। घर, मोहल्ले और कॉलोनी का माहौल देखने लायक होता है। और हां, इसी दिन तो हवन कुंड, मस्तो का झुण्ड अपने पूरे सबाब पर निकलता है। कोई दोस्त घर में छुपा बैठा है, और रंगों से डर रहा है तो सोचों उनकी तो सामत ही आ गयी। इसी तरह होली के साथ हमारी कई यादें जुड़ीं हुयी है तो साथ ही हर होली पर न भूलने वाले पल भी इकट्ठा होते है।

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ये बात हुई होली की, पर क्या आप जानते है ? कि आखिर होली मनाई क्यों जाती है ? क्यों होलिका दहन किया जाता ? क्यों सभी लोग दुश्मनी भुलाकर एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाते है ? तो आज हम आपको इस बारे में बताने वाले है… किस तरह हुयी होली की शुरुआत तो किस तरह मनायी जाती थी होली….

  • होली का त्यौहार प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा हुआ है। राक्षस राज हिरण्यकश्यप ने घोर तपस्या के बाद ब्रह्मा से अमर होने का वरदान प्राप्त किया और इससे वह अभिमानी हो गया। वह खुद को देवता मानने लगा और उसने प्रजा को अपनी पूजा कराने से मजबूर कर दिया, लेकिन हिरण्यकश्यप की यह बात उसके ही पुत्र भक्त प्रहलाद ने नहीं मानी और उसकी पूजा करने से इनकार कर दिया। प्रहलाद भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने लगा।
    • इससे हिरण्यकश्यप बहुत क्रोधित हुआ और उसने प्रहलाद को मारने का षड़यंत्र रचना शुरू कर दिया। उसने प्रहलाद को हाथी से कुचलवाया, ऊंचे पहाड़ से नदी में धक्का दिया, लेकिन प्रहलाद बच गए। कई प्रयास विफल होने के बाद हिरण्यकश्यप ने होलिका के साथ षड़यंत्र रचा। होलिका हिरण्यकश्यप की बहन थी। उसे वरदान था कि उसे अग्नि नहीं जला सकती और जब होलिका अकेली अग्नि में प्रवेश करेगी, तभी अग्नि उसे नुकसान नहीं पहुंचाएगी।
      • हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से भक्त प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश करने को कहा। वह अपने वरदान के बारे में भूल गई और हिरण्यकश्यप की बातों में आ गई। जब वह आग में गई तो जलकर खाक हो गई, वहीं भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद को अग्नि से बचा लिया।
        • इससे बौखलाए हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र भक्त प्रहलाद को एक अग्नि से तपे हुए खम्भे से बांधकर मारना चाहा और खडग से उस पर प्रहार किया। तभी भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया और हिरण्यकश्यप का वध कर डाला। उसी दिन से होली को जलाने और भक्त प्रहलाद के बचने की खुशी में अगले दिन रंग गुलाल लगाए जाने की शुरुआत हो गई।

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