samacharvideo:आज ही का वो दिन था जिस दिन साहित्य का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए आसमान में सितारा बन गया था, जी हाँ हम बात कर रहे है रघुपति सहाय उर्फ़ फ़िराक़ गोरखपुरी की।

  • 28 अगस्त 1896 को जन्मे फ़िराक़ 3 मार्च 1982 को इस दुनिया से रुखसत हो गए थे।
  • इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम -ए करने के बाद उर्दू ग़ज़ल को अपनी कलम से नई ऊंचाइयों पर पहुचाने वाले फ़िराक साहित्य अकादमी पुरस्कार,भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा पद्म भूषण पुरस्कार के भी हक़दार बने।
  • वे गाँधी जी  के साथ असहयोग आंदोलन में सम्मिलित हुए और जेल भी गये।  उन्होंने कुछ दिनों आनन्द भवन, इलाहाबाद में पंडित नेहरू  के सहायक के रूप में कांग्रेस का कामकाज भी देखा।

फिराक़ एक बेहद मुँहफट और दबंग शख्सियत थे। एक बार वे एक मुशायरे में शिरकत कर रहे थे, काफ़ी देर बाद उन्हें मंच पर आमंत्रित किया गया। फिराक़ ने माइक संभालते ही चुटकी ली और बोले, ‘हजरात! अभी आप  कव्वाली सुन रहे थे अब कुछ शेर सुनिए’।

 इसी तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय  के लोग हमेशा फिराक़ और उनके सहपाठी अमरनाथ झा को लड़ा देने की कोशिश करते रहते थे। एक महफिल में फिराक़ और झा दोनों ही थे एक साहब दर्शकों को संबोधित करते हुए बोले,’फिराक़ साहब हर बात में झा साहब से कमतर हैं” इस पर फिराक़ तुरंत उठे और बोले, “भाई अमरनाथ मेरे गहरे दोस्त हैं और उनमें एक ख़ास खूबी है कि वो अपनी झूठी तारीफ बिलकुल पसंद नहीं करते”। फिराक़ की हाज़िर-जवाबी ने उन हज़रत का मिजाज़ दुरुस्त कर दिया।
अपने अंतिम दिनों में जब शारीरिक अस्वस्थता निरंतर उन्हें घेर रही थी वो काफी अकेले हो गए थे। अपने अकेलेपन को उन्होंने कुछ इस तरह बयां किया-

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं, यूँ ही कभूं लब खोले हैं, पहले फिराक़ को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं’।



आइये उनकी पुण्य तिथि पर रूबरू होते है उनके कुछ चुनिंदा शेरों से ..

कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम

उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम


रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गये

वाह री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम


भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती

उस को भी अपनी तबीयत का समझ बैठे थे हम


बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं

तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं।


तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में

हम ऐसे में तेरी यादों के चादर तान लेते हैं


फिराक़ गोरखपुरी उर्दू नक्षत्र का वो जगमगाता सितारा हैं जिसकी रौशनी आज भी शायरी को एक नया मक़ा दे रही है। इस अलमस्त शायर की शायरी की गूँज हमारे दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी। 

बकौल फिराक़ 

‘ऐ मौत आके ख़ामोश कर गई तू, सदियों दिलों के अन्दर हम गूंजते रहेंगे’।


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