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‘यम’

मैं मां के पास बैठा था। 37 साल पहले यही तारीख थी — 29 मार्च। मां ने रात में मुझे अपने पास बुलाया था और मुझे ज़िंदगी का आख़िरी संदेश देने की कोशिश कर रही थी। कहते हैं सिर में चोट लगने से आदमी की पुरानी यादें जाती रहती हैं,मैं तीन बार स्कूटर से गिरा, एक बार सीढ़ी से गिरा लेकिन मेरी ये याद कहीं गई नहीं। पिछले 37 सालों से मेरे ज़ेहन में जस की तस पड़ी है। 
मां बहुत बीमार थी। वो धीरे-धीरे बोलती थी। मैं मां के सिर की ओर बैठा था। मां मुझे कहानी सुना रही थी। 

“ब्रह्मांड में सबसे चालाक मृत्यु के देवता हैं। मृत्यु के देवता यानी यम।

सब जानते हैं कि यम खुद आते हैं आत्मा को अपने साथ ले जाने के लिए, लेकिन कोई यम को दोष नहीं देता, क्योंकि वो हमेशा मृत्यु की वज़ह किसी और को बना देते हैं। किसी की मृत्यु बुढ़ापे से हो जाती है, कोई बहुत बीमार हो जाता है। कोई दुर्घटना में मारा जाता है, तो किसी को कुछ और हो जाता है। मतलब हमेशा मृत्यु की कोई न कोई वज़ह होती है। क्या कमाल है। मृत्यु, जो अवश्यंभावी है, वो हर बार किसी और पर तोहमत थोप जाती है। मानो यम का कोई कसूर ही नहीं।”

मैं मां की बातें ध्यान से सुन रहा था। समझ नहीं पा रहा था कि मां आधी रात को मुझसे मृत्यु की चर्चा ही क्यों कर रही है। लेकिन मैं कुछ कह नहीं रहा था, सिर्फ सुन रहा था।”

“सुनो बेटा, राम तो खुद भगवान थे। उन्हें मरने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। लेकिन वो क्योंकि मृत्युलोक में आए थे, इसलिए उन्हें भी जीवन-मृत्यु के चक्र से गुजरना पड़ा।”

“मां, मैंने कृष्ण की मौत की कहानी तो सुनी है कि कैसे एक बहेलिए ने सोता हुआ हिरण समझ कर उन पर तीर चला दिया था, लेकिन राम की मृत्यु की कहानी मैंने कभी नहीं सुनी।”

“हां, राम की असल में मृत्यु नहीं हुई, उन्होंने इच्छा मृत्यु का वरण किया था, लेकिन इसके लिए भी यम ने परिस्थितियां पैदा की थीं। राम जी बहुत साल तक पृथ्वी पर शासन करते रहे। एक दिन यम एक साधु से वेश में उनके पास आए और कहने लगे कि वो अकेले में उनसे मिलना चाहते हैं। 

राम जी अकेले में मिलने को तैयार हो गए। उन्होंने अपने छोटे भाई लक्षमण  को आदेश दिया कि तुम कमरे के बाहर पहरा देना कि कहीं कोई हमारी बातचीत में दखल न दे। अगर किसी ने दखल दिया, तो उसे मेरे हाथों मरना होगा। 

लक्षमण अपने बड़े भैया के आदेश का पालन करने लगे। वो बाहर पहरा दे रहे थे कि अचानक दुर्वासा मुनि वहां पहुंच गए और राम से मिलने की इच्छा जताई। लक्षमण ने उन्हें रोका और कहा कि बड़े भैया कमरे में किसी से बात कर रहे हैं और इस वक्त कोई भीतर नहीं जा सकता। दुर्वासा को इतना सुन कर क्रोध आ गया। उन्होंने लक्षमण से कहा कि अगर इसी वक्त उन्हें राम से नहीं मिलने दिया गया तो वो राम को शाप दे देंगे। 

भारी दुविधा थी। अब क्या हो? लक्षमण जानते थे कि अगर उन्होंने भैया की बात की अनदेखी करते हुए दुर्वासा को कमरे में जाने दिया तो दुर्वासा को मरना होगा। और अगर नहीं जाने दिया तो भैया को दुर्वासा का शाप झेलना होगा। 

अजीब दुविधा की स्थिति थी। आख़िर में लक्षमण ने तय किया कि वो खुद भैया के कमरे में जाएंगे और भैया के क्रोध का शिकार बनेंगे। 

लक्षमण कमरे में घुस गए। राम ने लक्षमण को देखा तो बहुत क्रोध में आ गए। लेकिन वो लक्षमण से अथाह प्रेम करते थे, इसलिए उन्होंने उन्हें मृत्यु दंड तो नहीं दिया, पर देश निकाला दे दिया। 

भैया से दूर, दूसरे देश में जाना, लक्षमण के लिए ये मृत्यु से भी बुरा था। उन्होंने तय किया कि वो सरयू नदी में जाकर जल समाधि ले लेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया। 

जब राम को लक्षमण के जल समाधि लेने की ख़बर मिली तो उन्होंने भी जल समाधि लेने का फैसला ले लिया।”

“मतलब यहां भी यम देवता ने परिस्थितियां पैदा कर दीं, खुद कुछ नहीं किया।”

“हां, बेटा, यही सत्य है। यम देवता सिर्फ परिस्थितियां पैदा करते हैं।”

“लेकिन मां, जिस वक्त यम देवता साधु बन कर राम जी से मिलने आए थे, उस वक्त हनुमान जी कहां थे? वो होते तो यम देवता की हिम्मत नहीं होती पास आने की।”

“बिल्कुल ठीक कह रहे हो बेटा। उस दिन सुबह हनुमान जी राम जी की अंगूठी ढूंढने पाताल लोक चले गए थे। राम जी बैठे थे कि उनकी अंगूठी उंगली से निकल कर ज़मीन में नीचे जा गिरी। राम जी ने हनुमान जी से कहा कि जाओ, मेरी अंगूठी ढूंढ कर ले आओ। हनुमान जी पाताल लोक तक चले गए। वहां पाताल लोक के देवता ने हनुमान जी से कहा कि यहां तो इतनी अंगूठियां हैं, तुम कैसे पहचानोगे कि कौन सी राम जी की है?

हनुमान जी समझ गए कि राम जी ने उन्हें जान बूझ कर यहां भेजा है। वो फटाफट लौटे, लेकिन तब तक राम जी सरयू में जा चुके थे।”

“पर मां, मैं कहीं नहीं जाऊंगा। आपके पास यम देवता को मैं नहीं आने दूंगा।”

मां मुस्कुरा रही थी। बहुत धीरे से मां ने कहा था कि तुम सुबह दस बजे बैंक चले जाना, कुछ पैसे निकाल लाना। ज़रूरत पड़ेगी।

“मैं सुबह बैंक जा कर पैसे निकाल लाऊंगा, मां।”

ठीक दस बजे मैं भाग कर बैंक गया था। स्टेट बैंक घर से कुछ ही दूर था। मैं भाग कर गया, भाग कर लौटा था। जब मैं लौटा तो मां को ज़मीन पर उतारा जा चुका था। पिताजी मां के मुंह में तुलसी का एक पत्ता और थोड़ा सा गंगाजल डाल चुके थे। मां अपने दोनों हाथ जोड़ चुकी थी। खिड़की के ऊपर एक काला कौवा कांव-कांव कर रहा था। 

यम देवता रात में ही अपनी योजना बना चुके थे। मां ने रात में ही मुझे बहुत बार इशारे में ये सब बताने की कोशिश की थी कि वो कल चली जाएगी। पर मैंने भी तय कर लिया था कि यम को आने नहीं दूंगा। पर कौन रोक पाया है यम को, जो मैं रोक लेता।

यम आए थे। पिताजी बेबसी से देखते रह गए थे। सबने कहा था कि मां कैंसर से मर गई, लेकिन मैं जानता था कि वो तो बस बहाना था। यम ने बीमारी के ऊपर ठीकरा फोड़ा था। ठीक वैसे ही जैसे सोलह साल बाद पिताजी को ये कह कर ले गए कि उन्हें मलेरिया के मच्छर ने काट लिया था। ठीक वैसे ही जैसे कि चार साल पहले मेरे छोटे भाई को ले गए थे, ये कह कर उसे अचानक हृदयघात हुआ। 

मैं यम को पहचानता हूं। वो दबे पांव आता है और चुपचाप ले जाता है। अपने किए का दोष किसी और पर मढ़ देता है। पर हम कर भी क्या सकते हैं? जैसे जीवन सत्य है, वैसे ही मृत्यु भी सत्य है। जो लोग इस सत्य को समझ लेते हैं, यम उनका दोस्त हो जाता है, और यम जिसका दोस्त हो जाता है, यम उसे अपना दर्प नहीं दिखाता। जो यम के सत्य को जानते हैं, वो अपने कर्म ऐसे रखते हैं कि उन्हें यम का ख़ौफ नहीं सताता। वो इस संसार से जाते हैं दोनों हाथ जोड़ कर ईश्वर को धन्यवाद देते हुए। जैसे मेरी मां दोनों हाथ जोड़ कर इस संसार से गई थी।

Sanjay Sinha

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By admin

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