samacharvideo: कल मैंने अर्चना की कहानी आपको सुनाई थी। मैंने बताया था कि अर्चना की शादी नहीं हुई है और सिंगापुर में रहने वाले एक लड़के ने उससे शादी में दिलचस्पी दिखलाई है। पर अर्चना शादी के लिए तैयार नहीं हुई। मैं उसे समझाने के लिए उसके घर गया था, पर उसने मुझसे कहा कि संजय भैया, मैं ये गारंटी देती हूं कि चाहे जैसी भी परिस्थति बने, मैं उसे खुश रख लूंगी। लेकिन यहीं उसने ये सवाल भी मुझसे पूछ लिया कि क्या मैं खुश रहूंगी?
मैंने अर्चना की पूरी कहानी आपको सुना दी है। पर यहीं ये बहस शुरू हो गई कि खुशी क्या है?

मेरी कल की कहानी पर एक-एक महिला ने यही लिखा कि अर्चना का सवाल बहुत जायज़ है। सबने कहा कि अपनी खुशी बहुत महत्वपूर्ण सच्चाई है, जिसकी हम सबसे अधिक अवहेलना करते हैं। एक-एक महिला परिजन ने कहा कि शादी के बाद महिलाएं एक बहुत बड़े झूठ को सच मान कर जीने लगती हैं।
फेसबुक की बात छोड़िए, संजय सिन्हा के घर में ये बहस का मुद्दा बन गया कि खुशी का मतलब क्या है? मेरे कई मित्रों ने फोन किया और मुझसे पूछा कि अर्चना को किस तरह की खुशी चाहिए? उसने ऐसा कैसे पूछ लिया कि क्या वो खुश रह पाएगी? अगर वो चाहेगी, तो खुश रहेगी, नहीं चाहेगी तो नहीं रहेगी।

मैंने आख़िर अर्चना को फोन कर लिया। उससे पूछ लिया कि तुम्हारा ऐसा कहने का मतलब क्या था? तुमने ऐसा क्यों कहा कि मैं अपने होने वाले पति और उसके परिवार को खुशी दे सकती हूं, पर सवाल ये है कि क्या मैं खुश रह पाऊंगी? अगर हर लड़की तुम्हारी तरह सोचने लगे, फिर तो कोई लड़की शादी करेगी ही नहीं।
अर्चना हंसने लगी। कहने लगी कि संजय भैया, आप मेरे सवाल को लड़का या लड़की पर क्यों समेट रहे हैं?
मैंने तो ये पूछा था कि क्या मैं खुश रह पाऊंगी? दरअसल मैं लड़का होती तो भी ये सवाल खुद से पूछती।
“पर खुशी का संबंध शादी से किस तरह है? मुझे तो लगता है कि लड़कियां शादी का इंतज़ार करती हैं। यकीनन वो खुश भी होती ही होंगी।”
“हो सकता है। मैं हर लड़की के बारे में कैसे कह सकती हूं। पर आप अपनी ही कहानी पर आई प्रतिक्रियाओं को दुबारा पढ़िए। आप सच को समझ जाएंगे। आपकी ज्यादातर महिला परिजनों ने यही लिखा है कि वो अपने पति और उनके ससुराल वालों को खुश रखती हैं, पर ये सवाल उनके मन में भी उठता है कि क्या वो खुश हैं?”

दरअसल शादी के बाद दो लोग एक दूसरे पर निर्भर होने लगते हैं। ये निर्भरता एक-दूसरे से पाने की उम्मीद जगाती है। पर अधिकतर मामलों में एक पक्ष तो पाता है, दूसरा देता रह जाता है। यहीं से मन में क्षोभ पैदा होता है, और पता ही नहीं चलता कि कब लड़की अपनी ज़िंदगी जीना ही छोड़ चुकी है।
एक सच्चाई ये भी है कि शादी के बाद हम हम नहीं रह जाते। हम मुखौटा ओढ़ लेते हैं। मुखौटे सभी पहनते हैं, लेकिन शादी के बाद लड़कियों को अधिक मुखौटे पहनने पड़ते हैं। पत्नी का मुखौटा, बहू का मुखौटा, मां का मुखौटा। और यही मुखौटा खुश नहीं रहने देता। हमें खुशी वहीं मिलती जहां हमें कोई मुखौटा नहीं लगाना पड़ता।
ऐसे में मन में ये सवाल को पूछ कर देखिए कि क्या हम खुश हैं? जो शादी को ज़िम्मेदारी मान कर नए रिश्ते में प्रवेश करता है, वो खुश रहता है।
जो ये सोच कर शादी करता है कि शादी तो सभी की होती है, वो खुशी ढूंढता रह जाता है। सच से है कि किसी को लाल रंग पसंद आता है, किसी को नीला। इसमें किसी रंग का कोई दोष नहीं होता।
जो वज़ह को समझ कर करते हैं, वो खुश रह पाते हैं।
अर्चना ने मेरी पूरी बात सुनी फिर उसने कहा कि भैया, अभी मैं भले अपनी बात ठीक से नहीं समझा पा रही, पर अपनी खुशी से बढ़ कर किसी के लिए कुछ नहीं। ये स्वार्थ नहीं है, ये ईमानदारी है। ये पलायन नहीं है, ये जीना है। खुद का संतुष्ट होना सबका पहला हक है।
“इसका मतलब तुम शादी नहीं करोगी?”
“कर भी सकती हूं। पर उसी से जो मुझसे ज़िम्मेदारी की वज़ह से नहीं, साथ की वज़ह से शादी करेगा। ज़िम्मेदारी में कुछ गलत नहीं, पर उसके लिए मैं देर कर चुकी हूं।”

Sanjay Sinha
#ssfbFamily

By admin

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