samacharvideo:   “शिद्दत”

ऐसा हो ही नहीं सकता है कि बैंगन के भर्ता से दामाद के स्वागत वाली कहानी मैंने आपको पहले न सुनाई हो। पर जब कभी मैं कहीं खाने जाता हूं या कोई मेरे घर खाने आता है तो मुझे ये वाली कहानी ज़रुर याद आ जाती है। मुझे लग रहा है कि ये कहानी मैंने आपको पहले भी सुनाई है, लेकिन कहानी का मर्म इतना बढ़िया है कि दुबारा सुन लेने में भी कोई हर्ज़ नहीं।

एक बार एक दामाद शादी के बाद पहली बार ससुराल गया। वहां सास ने दामाद के स्वागत में कई तरह के व्यंजन बनाए। मटर-पनीर की सब्जी, आलू-गोभी दम, पकौड़े, टमाटर की चटनी और बैंगन का भर्ता। दोपहर में भोजन परोसा गया। दामाद थाली में इतनी चीज़ें देख कर बहुत खुश हो गया लेकिन उसे बैंगन का भर्ता बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने सोचा कि पहले बैंगन का भर्ता खा लेते हैं, फिर अच्छी-अच्छी चीजें खाएंगे। उसने सबसे पहले बैंगन का भर्ता खा लिया। अब वो बाकी चीजों का स्वाद लेना चाह रहा था पर सास ने देखा कि दामाद की थाली में बैंगन का भर्ता खत्म हो गया, तो उन्होंने थोड़ा और भर्ता डाल दिया। 
अब दामाद उलझन में था। क्या करे। कैसे कहे कि उसे भर्ता नहीं पसंद। उसने फिर उस भर्ता को पहले खत्म किया। सास ने और भर्ता डाला। दामाद ने वो भी खा लिया। कई बार ऐसा हुआ और सास के मन में बैठ गया कि दामाद को बैंगन ही बहुत पसंद है। उस दिन दामाद ने कुछ और नहीं खाया। उसका पेट सिर्फ बैंगन के भर्ते से भरा। 
इस कहानी का जो मर्म है, उसे मैं पहले भी बता चुका हूं पर आज मैं इस कहानी को यहीं रोक कर आपको कहीं और ले चलता हूं। बात ये है कि जब मेरी शादी हुई थी, तब पिताजी पटना में रहते थे। मेरी शादी पंजाबी परिवार में हुई थी और हमारा खाना-पीना बिल्कुल अलग तरीके का था। बचपन में हम रोटी-सब्ज़ी का नाश्ता करते थे, दोपहर में भात-दाल-सब्जी खाते थे और रात में फिर रोटी या पराठा चलता था। पर मेरे पंजाबी ससुराल में भात खाने का रिवाज़ ही नहीं था। जिस दिन मेरी शादी हुई, उसके अगले दिन मैंने दिल्ली में Sanjaya Kumar Singh को खाने पर बुलाया था। मैंने पत्नी से कहा था कि तुम कुछ अच्छा सा बना देना।
संजय सिन्हा को पता नहीं पता था कि उनकी सास ने अपनी बेटी को स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में टॉप करना सिखाया था, खाना बनाना नहीं। वो तो लड़की होने के नाते उसने थोड़ा-बहुत सीख लिया था। उसने राजमा बनाना सीख लिया था। रोटी बनानी भी उसे आती थी। भात को वो लोग चावल कहते थे और चावल खाने का रिवाज़ घर में था ही नहीं। हालांकि राजमा के साथ चावल ही लोग खाते हैं, लेकिन मेरी पत्नी को चावल पसंद ही नहीं था। खैर, संजय सिंह के लिए पहली बार खाना बना था राजमा और रोटी। 
मुझे दिल्ली आए समय बीत चुका था। मैं समझ चुका था कि दिल्ली में लोग दोपहर में दाल, रोटी और सब्जी खाते हैं। ऐसे में उस दिन खाना हमने आराम से खा लिया। 

पत्नी बहुत खुश हुई कि वो खाना बनाने की पहली परीक्षा में ही पास हो गई है। 

जीवन चलता रहा। कभी दफ्तर की कैंटीन में, कभी एक्सप्रेस ढाबा में, और कभी घर में खाना खाते रहे। फिर एक ऐसा समय आ गया कि पिताजी पटना से हमारे पास दिल्ली चले आए। 

मैंने पत्नी से कहा कि अब दफ्तर की कैंटीन, एक्सप्रेस ढाबा बंद। अब घर में खाना बनेगा। 

जिस दिन पिताजी आए, दोपहर में खाना बना राजमा और रोटी। जब हम पटना में थे तब हमारे यहां राजमा नहीं बनता था। पता नहीं क्यों लेकिन हमारे घर राजमा नहीं बनता था। पिताजी शायद राजमा नहीं खाते होंगे। मुझे ठीक से याद नहीं, पर हमारे यहां ऐसा माना जाता था कि राजमा खाने से पेट में गैस बनती है। हम दाल खाते थे, ज्यादात अरहर की दाल। मुझे तो लगता है कि पिताजी चना या उड़द की दाल भी नहीं खाते थे। हां, दोपहर में उनका प्रिय भोजन अरहर की दाल, सूखी सब्जी और भात था। 

दोपहर में वो रोटी नहीं खाते थे। वैसे भी जब मैं मामा के पास मध्य प्रदेश रहने गया था तो पहली बार मैंने देखा था कि वहां लोग दोपहर में रोटी और चावल दोनों साथ खाते थे। पर पटना में हमारे यहां चावल और रोटी साथ नहीं खाते थे।

खैर, मैं पत्नी को ये बताना ही भूल गया था कि पिताजी क्या नहीं खाते हैं। उसने मन में बहुत सोचा और खाने में पहले दिन बना राजमा और रोटी।

पत्नी को उम्मीद थी कि उस दिन संजय सिंह को राजमा बहुत पसंद आया था तो पिताजी को भी राजमा पसंद आएगा। खाने की मेज़ पर लगा राजमा। पिताजी सोचते रहे कि अब कुछ और आएगा, पर यहां तो राजमा रोटी और दही का जुगाड़ था। पिताजी ने थोड़ा सा राजमा खाया। वो मेरी ओर देख रहे थे। मैं चुपचाप राजमा खा रहा था। फिर धीरे-धीरे वो भी राजमा खाने लगे। जिस तरह वो खा रहे थे, मुझे अचानक याद आया कि अरे, पिताजी तो राजमा खाते ही नहीं। अब क्या था, मैं एकदम से पूछ बैठा कि आप राजमा खा लेंगे? 

पिताजी ने कहा हां, इतना अच्छा बना है, क्यों नहीं खाऊंगा, इस तरह वो एक कटोरी राजमा खा गए। पत्नी को लगा कि पिताजी को राजमा बहुत पसंद है, तो उसने एक कटोरी राजमा और सामने रख दिया। 

अब क्या हो। पिताजी उसे भी खा गए। 

खाने के बाद पिताजी उठे और थोड़ा टहल कर लेट गए। मैं उनके पास पहुंचा। “पिताजी, तबियत तो ठीक है न?”

“हां, पेट में थोड़ी गैस सी बन रही है।”

“आपको राजमा सूट नहीं करता। आपने क्यों खाया?” 

“अब बहू ने बनाया तो खा लिया।”

“पर आपको कहना चाहिए था कि आप राजमा नहीं खाते।”

“ऐसा कहता तो उसका दिल टूट जाता। उसने इतनी मेहनत से बनाया था।”

“अब आपकी तबियत खराब हो गई, उसका क्या?”

“तबियत तो ठीक हो जाएगी। पर उसे बुरा लगता तो मुझे अधिक तकलीफ होती।”

“पर पिताजी…!”

“पर कुछ नहीं बेटा। धीरे-धीरे वो समझ जाएगी कि हम क्या खाते हैं, क्या नहीं। वैसे राजमा पंजाबी लोगों का मुख्य खाना है। वो दाल की तरह राजमा खाते हैं। इसमें काफी प्रोटीन भी होता है। मैं धीरे-धीरे इसे खाने लगूंगा और धीरे-धीरे वो अरहर की दाल भी बनाने लगेगी। तुम चिंता मत करो। वो धीरे-धीरे सबकुछ सीख लेगी। खाने का क्या है, समय के साथ आदमी सब खाने लगता है, सब बनाने लगता है। पर किसी के दिल को चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। उसे जो सर्वश्रेष्ठ आता है, उसकी तारीफ करनी चाहिए। ज़िंदगी में शिकायतें जितनी कम रहेंगी, ज़िंदगी उतने ही आराम से गुजरती है। ज़िंदगी इतनी बड़ी नहीं होती कि उसे शिकायतों में गुज़ारा जाए।”

मुझे याद है कि कैसे पिताजी धीरे-धीरे राजमा खाने लगे थे। दोपहर में रोटी भी खाने लगे थे और मुझे ये भी याद है कि पत्नी अरहर की दाल बनाने लगी थी, दोपहर में भात भी बनाने लगी थी। पिताजी ने कभी बहू की शिकायत नहीं की। 

पिताजी को गए हुए बीस साल बीत गए, पर उनकी बहू आज भी उन्हें शिद्दत से याद करती है। घर में राजमा बनता है, तो एक बार पिताजी को वो ज़रूर याद करती है। कहती है कि शिकायतें न हों तो ज़िंदगी आराम से गुज़रती है।

सचमुच जिन्हें ज़िंदगी से शिकायतें कम होती हैं, वो खुश रहते हैं।

Sanjay Sinha

#ssfbFamily

By admin

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