Ludo Supreme [CPR] IN

samacharvideo: फिल्म ‘तीसरी कसम’ जब मैंने देखी थी, तब मैं उसे ठीक से समझ नहीं पाया था। फिल्म एक बैलगाड़ी चलाने वाले की नौजवान की कहानी है। एक बार वो एक लड़की को अपनी गाड़ी में बिठाता है। रास्ते भर वो उसे अपनी कहानियां सुनाता है। बैलगाड़ी हांकते हुए वो कई यादों से गुज़रता है। वो याद करता है कि कैसे उसने एक बार एक चोर को अपनी गाड़ी में बिठाया था और फंस गया था। तब उसने कसम खाई थी कि कभी किसी चोर को अपनी गाड़ी में नहीं बिठाएगा। फिर एक बार वो बांस गाड़ी में लाद कर ले जा रहा होता है, अचानक उस पर मुसीबत आती है और वो दूसरी कसम खाई थी कि अब कभी वो बांस का सामान अपनी गाड़ी में नहीं रखेगा। 

अब जब वो लड़की को अपनी गाड़ी में ले जा रहा है, उसे अपनी पूरी कहानी सुनाता है। बैलगाड़ी वाला लोक गीतों और कथाओँ के माध्यम से अपनी कहानी को याद करता है। सफर लंबा है। लड़की को गांव से दूसरे गांव एक मेले में जाना है। लंबे सफर में लंबी बातों के बीच बैलगाड़ी हांक रहे नौजवान को लड़की से प्यार हो जाता है। फिर उसे पता चलता है कि वो एक नाचने वाली है। 

बहुत छोटा था, तब मैंने ये फिल्म देखी थी। ठीक से मुझे कहानी भी याद नहीं। पर इतना याद है कि राज कपूर फिल्म में बैलगाड़ी हांकने वाले बने थे और वहीदा रहमान वो नर्तकी थीं। नर्तकी बैलगाड़ी वाले पर फिदा तो है, लेकिन उसे अपनी सच्चाई पता है। 

फिल्म खत्म होती है राज कपूर की तीसरी कसम से। तीसरी कसम थी कि अब कभी वो किसी नाचने वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बिठाएगा।  

मेरा ड्राइवर इन दिनों छुट्टी पर है। मैं अपनी गाड़ी खुद ही चला रहा हूं। पर बहुत जगह मैं गाड़ी चलाने से बचता हूं। इसकी सबसे बड़ी वज़ह ये है कि मैं अकेला गाड़ी में बैठा-बैठा बोर होने लगता हूं। गाड़ी चलाते हुए फोन पर बात कर नहीं सकते। रेडियो सुनने में मज़ा नहीं आता। ऐसे में इन दिनों बहुत जगह मैं टैक्सी में चल रहा हूं या फिर दफ्तर की गाड़ी में। 

कल मुझे किसी से मिलने जाना था और मैंने दफ्तर से गाड़ी ले ली। गाड़ी में मैं कल भी ड्राइवर की बगल में यानी आगे की सीट पर बैठा। 

संजय सिन्हा अपनी आदत से बाज तो आऩे वाले नहीं। बस, कल फिर ड्राइवर से बातचीत शुरू हो गई। 

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“राजेश कुमार।”

“कहां के हो?”

“बनारस के पास एक गांव है।”

“शादी हो गई?”

“नहीं, सर।”

“फिर अकेले हो?”

“बचपन से ही अकेला हूं, सर।”

अब कहानी में ट्विस्ट आ चुका था। राजेश बचपन से अकेला है, इसका क्या मतलब? 

“साहब, मेरे पिता दूसरे शहर में सरकारी नौकरी करते थे। मैं मां के साथ गांव में था। गांव में और रिश्तेदार थे, पर किसी से ज़्यादा संबंध नहीं था। गांव का हाल तो आप जानते ही हैं। जब मैं बहुत छोटा था, एक दिन मेरी मां बहुत बीमार हो गई। पिताजी मां को देखने आए थे। फिर मां मर गई। मैं बहुत रोया। पिताजी कुछ दिन गांव में रुके, फिर शहर चले गए। मुझे नहीं पता कि वो मुझे किसके पास गांव में छोड़ गए थे। मैं कैसे पलता रहा, पता नहीं। मैं पिताजी के लिए बहुत रोता था। पर पता नहीं क्यों पिताजी मुझे अपने साथ शहर नहीं ले गए। 

मैं बड़ा होता रहा। गांव के स्कूल में कुछ-कुछ पढ़ाई भी हुई। पर सब रुका सा था। फिर एक दिन पता नहीं किसके साथ रेलगाड़ी में बैठ कर दिल्ली चला आया। यहां बस में किसी ने खलासी का काम दे दिया। खलासी बनने का फायदा ये हुआ कि पूरी दिल्ली देख ली। बस वाले ने ही बस की ड्राइवरी सिखा दी। ऐसे कई साल गुज़र गए। 

फिर मुझे यहां आपके ऑफिस में ड्राइवर का काम मिल गया।

“पिताजी?”

“यही तो दुख है कि पिताजी अब रिटायर होने के बाद गांव चले आए  हैं। वो चाहते हैं कि मैं उन्हें अपने पास दिल्ली ले आऊं। सर, जब तक वो शरीर से सक्षम थे, उन्होंने घर में किसी को नहीं देखा। अब बूढ़े होने के बाद वो चाह रहे हैं कि मैं उन्हें अपने पास रखूं। पर मेरा मन ही फट गया है। अब मेरा मन उन्हें अपने साथ रखने का नहीं है। मैं नहीं चाहता कि वो मेरे पास आएं। वो मुझे रात-दिन शाप देते हैं। खैर…आप बताइए सर, मुझे क्या करना चाहिए?”

मैं चुप था। 

मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। मेरे पास कोई जवाब नहीं था। आपके पास हो तो ज़रूर जवाब दीजिएगा। राजेश आज फेसबुक पर अपनी कहानी पढ़ेगा। 

अब संजय सिन्हा ने पहली कसम खाई है कि अब वो ड्राइवर के बगल में बैठ कर उसकी कहानी नहीं सुनेंगे।

बहुत दुख होता है ऐसी कहानियां सुन कर। बहुत दुख होता है किसी के दरकते रिश्तों की कहानी सुन कर। 

रिश्ता सिर्फ दिल की धड़कनों का नाम भर नहीं। रिश्ते ज़िम्मेदारी भी होते हैं। ज़िम्मेदारी एक पिता होने की, ज़िम्मेदारी एक पुत्र होने की।

Sanjay Sinha

#ssfbFamily
(आप samacharvideo से facebook और twitter पर भी जुड़ सकते है)

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *