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‘सच्ची कमाई’

मेरी मां की मृत्यु हो गई थी। मां का शरीर बिस्तर से उतार कर ज़मीन पर रख दिया गया था। मुझे एक-एक क्षण याद है। बहुत से लोग मां के अंतिम दर्शन के लिए आ रहे थे। पहले अड़ोस-पड़ोस से, फिर दूर-दूर से। 

हमारे घर का पूरा अहाता लोगों से भर गया था। फिर सड़क तक लोगों का हुजूम था। सब रो रहे थे। 

37 साल पहले आज से ठीक दो दिन बाद की तारीख थी। आप सोच सकते हैं कि मैं मां को दो दिन पहले ही क्यों याद कर रहा हूं। कायदे से मुझे दो दिन बाद, यानी 29 मार्च को ये सब याद करना चाहिए था। 

वो भी बताऊंगा कि मैंने आज दो दिन पहले ही मां को क्यों याद किया। लेकिन पहले मैं आपको उन लोगों से मिलाने ले चलता हूं, जो मां की मृत्यु के बाद मां के दर्शन के लिए उमड़ पड़े थे। 

मेरी मां कोई राजनेता नहीं थी। वो कहीं नौकरी नहीं करती थी। जिसने भी सुना कि उनकी मृत्यु हो गई है, वो थम गया। उसने उस दिन दफ्तर छोड़ दिया। उसने उस दिन दुकान बंद कर दिए। मुझे याद है, सब के सब मां के दर्शन को चले आए थे। उनमें से बहुत से लोग तो ऐसे थे जो कभी मां से मिले भी नहीं थे। पर किसी न किसी के मुंह से मां की तारीफ सुने थे। 

मैं पहले भी आपको बता चुका हूं कि मार्क ज़करबर्ग ने बहुत बाद में फेसबुक की कल्पना की थी, मेरी मां ने बहुत पहले ही फेसबुक को जीना शुरू कर दिया था। उसने अपने इर्द-गिर्द रिश्तों का बहुत बड़ा संसार खड़ा कर लिया था। मां के होते हुए हमारे दूर-दूर से परिचित भी हमारे सगे रिश्तेदार थे। वो हमारे घर आते थे, मां उनकी भरपूर आवभगत करती थी। पिताजी के दोस्त, उनके परिवार, उनके परिवार वालों के परिचित, सभी हमारे घर आते थे। किसी की शादी हो, कोई बीमार हो, मां उनकी मदद को खड़ी हो जाती। 

और ऐसे में मां जब संसार से चली गई तो पूरा शहर मां के दर्शन को खड़ा हो गया था। 

मैं कई बार इस कहानी को लिख चुका हूं। पर आज जब मां को याद कर रहा हूं, तो एक ख़ास वज़ह है। 

कल मैं मथुरा गया था। मथुरा में अपने परिजन Pavan Chaturvedi के पिता श्री विष्णु चौबे जी की कल उठावनी थी। मैं पंद्रह दिन पहले ही पवन जी के पिताजी से मिल कर आया था। तब वो बिल्कुल स्वस्थ थे। पर अचानक उन्हें हृदयघात हुआ और वो नहीं रहे। 

कल उन्हें श्रद्धांजलि देने शहर भर से लोग पहुंचे थे। ऐसे लोग भी पहुंचे थे जिन्हें चतुर्वेदी परिवार शायद नहीं पहचानता था। उन्हीं में से एक की चर्चा कल पवन भैया कर रहे थे। एक सज्जन ने पिता की श्रद्धांजलि पर कहा कि करीब तीस साल पहले वो अपनी बेटी की शादी का निमंत्रण पत्र लेकर श्री विष्णु चौबे के पास गए थे। चौबे जी ने उन्हें अपने पास बिठाया। खूब बातें कीं। फिर उन्होंने उनकी आंखों में झांक कर कहा कि आप कुछ उदास लग रहे हैं। जो सज्जन निमंत्रण पत्र लेकर गए थे, उन्होंने कुछ कहा नहीं। फिर अचानक विष्णु चौबे जी उठे, कमरे में गए और एक लिफाफे में कुछ रूपए लाकर उनके हाथ में रख दिए। 

आदमी हैरान था। उसने कुछ कहा नहीं था। पर वो उनके हाथ में रुपए रख कर कह रहे थे, इसे रख लीजिए। 

आदमी ने मना किया। चौबे जी ने कहा कि बिटिया की शादी है, उसमें कमी नहीं रहनी चाहिए। बच जाएंगे तो लौटा दीजिएगा।

इतना कह कह कर आदमी चुप हो गया। 

उस आदमी ने घाट पर इस घटना का ज़िक्र किया, एक ऐसी घटना जिसके बारे में पवन भैया समेत किसी को पता नहीं था। ये तो एक उदाहरण है। किसी की मदद करना, किसी की ज़रुरत को समझना। दाहिने हाथ से दिया, बाएं हाथ को ख़बर न होना। 

इनकी चर्चा तब होती है, जब आदमी संसार से चला जाता है। आदमी की अंतिम यात्रा पर कितने कंधे उसे मिले, यही उसकी असली कमाई होती है। मैंने बहुत से लोगों को मौत के बाद चार कंधों के लिए तरसते हुए भी देखा है। मैंने लोगों को किसी अनजान की मौत के बाद तड़पते हुए भी देखा है। 

बहुत से लोग नहीं जानते, पर जो जानते हैं, उन्हें पता है कि आदमी की सच्ची कमाई घाट पर ही नज़र आती है। 

है तो ये फिल्मी गाना, लेकिन इसका अर्थ बहुत गहरा है-

“इक दिन बिक जाएगा,माटी के मोल जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल…”

37 साल पहले मैंने इस बोल की कीमत देखी थी। कल फिर मैंने उसी बोल की कीमत को महसूस किया। यही सत्य है। रहता कुछ नहीं। बस यही रह जाता है। 

Sanjay Sinha

#ssfbFamily

By admin

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