samacharvideo: ‘चौदव्ही का चाँद, क्या हुआ तेरा वादा, दर्द-ए-दिल…’ इन गानों को तो आप शायद ही भूल पाये। ये गाने आपके दिल से जुड़े है। अक्सर इन गानों को लोग अकेले में सुनते है, जब दिल न लगे कहीं, जब दुनिया से ऊबने लगे, तब ये ही गाने आपको दुनिया में वापस लाते है और आपको नार्मल कर देते है।

ऐसे गानों के सम्राट ‘मोहम्मद रफ़ी’ का आज जन्मदिन है। आज के दिन ही मोहम्मद रफ़ी ने पंजाब के अमृतसर में सन 1924 को जन्म लिया था। 

रफ़ी ने लोगों को गाने के दम पर जीना सिखाया। दुनिया को देखना सिखाया। दिलों को जोड़ना भी सिखाया। मोहब्बत का एक नया रंग दिखाया। ऐसे रफ़ी को आप शायद ही भूल पाये। रफ़ी ने 1980 में ये दुनिया छोड़ दी, पर लोग उन्हें नही छोड़ पाये। आज भी रफ़ी लोगों की यादों में जिंदा है। 
आइये जानते है रफ़ी से कुछ अनसुनी बाते:

  • रफ़ी साहब 24 दिसम्बर 1924 को अमृतसर में जन्म लिया।
  • पिताजी का नाम हाजी अली मुहम्मद और माताजी का नाम बेगम विकलिस।
  • रफ़ी साहब की 7 संतानें, जिनमे 4 पुत्र और 3 पुत्रियां है।
  • मोहम्मद रफ़ी ने करीब 26 हजार गानों को रिकॉर्ड किया।
  • रफ़ी साहब को ‘शहंशाह-ए-तरन्नुम’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • मोहम्मद रफ़ी के बड़े भाई की अमृतसर में नाई की दुकान थी और रफ़ी बचपन में इसी दुकान पर आकर बैठते थे।
  • मोहम्मद रफ़ी, एक फ़क़ीर के पीछे लग जाते थे, जब वे छोटे थे, और फ़क़ीर जो गाता था, वे भी उनकी नकल करने लगते थे।
  • फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया, बेटा, एक दिन तू जरूर गीतों की बुलंदियों को छुएगा ।
  • शम्मी कपूर कहते थे कि ”रफ़ी उनकी आवाज है, रफ़ी के बिना मेरी फिल्मो में मैं अधूरा हूं। ‘
  • साल 1965 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा। 
  • रफ़ी को चौदवीं का चाँद के लिए फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला था।
  • ‘तेरी प्यारी प्यारी सूरत को’ के लिए मोहम्मद रफ़ी को दुसरी बार फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला।
  • साल 1966 में फ़िल्म सूरज के गीत’बहारों फूल बरसाओ’ बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके लिए उन्हें चौथा फ़िल्मफेयर एवॉर्ड मिला।
  • साल 1968 में शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ब्रह्मचारी के गीत ‘दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर’ के लिए उन्हें पाचवां फ़िल्मफेयर एवॉर्ड मिला।
  • 1977 में छठा और अंतिम फिल्म फेयर एवॉर्ड उन्हें ”क्या हुआ तेरा वादा …. ‘ गीत के लिए मिला।
  • रफ़ी का इंतेक़ाल, रमजान के दिनों में हुआ, वो भी रमजान के अलविदा के दिन।
  • जिस समय रफ़ी साहब का जनाजा निकल रहा था, उस समय लगातार बरसात होती रही। शायद आसमाँ भी रो रहा था।

    तो ऐसे थे हमारे मोहम्मद रफ़ी, आज भी हर युवा से लेकर बूढ़े लोगो के दिलों में मोहम्मद रफ़ी ज़िंदा है। 

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